सुप्रीम कोर्ट ने 5 जून को प्रमोशन में आरक्षण से संबंधित एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। उसके अनुसार केंद्र सरकार अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) समाज से आने वाले कर्मचारियों को प्रमोशन में आरक्षण देती रहेगी। सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में सुनवाई करते हुए कहा कि यह मामला संविधान पीठ में है, इसलिए इसपर आखिरी फैसला लेने का अधिकार उन्हीं के पास है। संविधान पीठ जबतक इस मामले में फैसला नहीं ले लेती है तब तक केंद्र सरकार एससी/एसटी सरकारी कर्मचारियों को प्रमोशन में आरक्षण देती रहेगी।
इस मामले में सरकार की ओर से पैरवी करने वाले अतिरिक्त सालिस्टिर जनरल(एएसजी) मनिंदर सिंह थे। उन्होंने कहा कि कर्मचारियों को प्रमोशन देना सरकार का दायित्व है। सुनवाई के दौरान उन्होंने कहा कि देश के अलग-अलग हाईकोर्ट के फैसलों के चलते केंद्र सरकार एससी/एसटी के कर्मचारियों को प्रमोशन में आरक्षण नहीं दे पा रही है। इसपर सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसलों पर रोक लगाते हुए कहा कि केंद्र सरकार प्रमोशन में आरक्षण दे सकती है।
उल्लेखनीय है कि कार्मिक विभाग ने 30 सितंबर 2016 को एक आदेश जारी किया था, जिसमें प्रमोशन में आरक्षण पर रोक लगा दी गई थी। इसके बाद से एसएसी/एसटी समाज से आने वाले सरकारी कर्मचारी प्रमोशन के लिए सरकार पर दबाव बना रहे थे। इसी बीच लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उपभोक्ता मामले खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण के मंत्री रामविलास पासवान ने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से मुलाकात कर दलितों की इस मांग को पूरा करवाने की मांग की थी। इस मांग के बाद ही केंद्र सरकार ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने एससी/एसटी को प्रोन्नति में आरक्षण के मामले में सरकार को कानून के मुताबिक चलने की इजाजत दी है। कोर्ट का कहना है कि कानून के मुताबिक प्रोन्नति देने पर सरकार पर कोई रोक नहीं है, जो कोर्ट के अगले आदेश के अधीन होगा। सुप्रीम कोर्ट के इस अंतरिम आदेश को सरकार जहां एससी/एसटी के हित में बड़ी राहत बता रही है, वही इस समाज के कर्मचारियों में खुशी की लहर है।
दूसरी ओर आरक्षण के विरोधियों का कहना है कि कानून के मुताबिक प्रोन्नति में आरक्षण की इजाजत दी गई है और आज की तारीख में दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश पर रोक नहीं है। दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश के मुताबिक सरकार को एम नागराज की व्यवस्था के अनुसार प्रोन्नति देने से पहले पिछड़ेपन के आंकड़े जुटाने होंगे। इन विरोधाभासी दावों का अलग मतलब निकला जा रहा है। इस आदेश के बाद एससी/एसटी को प्रोन्नति में आरक्षण को लेकर नई भ्रांति के नजरिए से भी देखा जा रहा है।
वैसे सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल व न्यायमूर्ति अशोक भूषण की पीठ ने सरकार की ओर से पेश एएसजी मनिंदर सिंह और आरक्षण का विरोध कर रहे प्रतिपक्षी वकील शांति भूषण व कुमार परिमल की दलीलें सुनने के बाद उपरोक्त आदेश दिया। पीठ ने कहा कि वे स्पष्ट करते हैं कि कानून के मुताबिक प्रोन्नति देने पर सरकार पर कोई रोक नहीं है, और यह सब इस मामले में कोर्ट के अगले आदेश के आधीन होगा।
इसके साथ ही कोर्ट द्वारा दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली केन्द्र सरकार की विशेष अनुमति याचिका के साथ ऐसे ही एक मामले ‘जरनैल सिंह बनाम लक्ष्मी नारायण गुप्ता’ के केस की सुनवाई को भी संलग्न कर दिया गया है। एएसजी मनिंदर सिंह ने 5 जून को इस केस से संबंधित 17 मई के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि विभिन्न उच्च न्यायालयों के आदेश के कारण प्रोन्नतियां रुकी हुई हैं, जबकि सरकार को अपने कर्मचारियों को प्रोन्नति देनी होती है।
मनिंदर सिंह ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की दो न्यायाधीशों की पीठ ने गत 17 मई को ऐसे ही एक मामले में आदेश दिया है। कोर्ट वही आदेश इस मामले में भी दे दे, ताकि प्रोन्नतियों पर लगी रोक की स्थिति हट सके। जबकि दूसरी ओर से सरकार का विरोध करते हुए शांति भूषण और कुमार परिमल ने कहा कि एससी-एससटी को प्रोन्नति में आरक्षण का मुख्य मामला पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के पास लंबित है। इतना ही नहीं मामला संविधान पीठ को भेजते समय कोर्ट ने यह भी कहा था कि अंतरिम आदेश के मुद्दे पर भी संविधानपीठ ही विचार करेगी। ऐसे में दो न्यायाधीशों की अवकाशकालीन इस पीठ को मामले पर सुनवाई नहीं करनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद ही सरकार को कानून के मुताबिक प्रोन्नति देने की इजाजत दिया। साथ ही इस मामले को जनरैल सिंह बनाम लक्ष्मी नारायण गुप्ता के केस के साथ सुनवाई के लिए लगाने का आदेश भी दिया। उल्लेखनीय है कि इसी केस में 17 मई को दो न्यायाधीशों द्वारा दिए गए आदेश में कहा गया था कि आरक्षित श्रेणी को आरक्षित श्रेणी में और अनारक्षित श्रेणी को अनारक्षित श्रेणी में तथा मेरिट के भी आधार पर प्रोन्नति दी जा सकती है।
इस मामले में केन्द्र सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट के गत वर्ष अगस्त के आदेश को चुनौती दी है। हाईकोर्ट ने उस आदेश में प्रोन्नति में आरक्षण देने वाला केन्द्र सरकार का 13 अगस्त 1997 का आदेश खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट ने फैसले का आधार सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के एम नागराज के 2006 के फैसले को बनाया था, जिसमें व्यवस्था दी गई है कि सरकार पिछड़ेपन के आंकड़े एकत्र करने के बाद ही प्रोन्नति में आरक्षण दे सकती है।
इस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने एससी और एससी के सरकारी कर्मचारियों को प्रोन्नति में आरक्षण देने के प्रावधान को संवैधानिक रूप से वैध करार दिया है। अपने पहले के एक निर्णय को बदलते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को विधि सम्मत तरीके से इस दिशा में आगे बढ़ने की स्वीकृति दे दी है। हालांकि ‘विधि सम्मत’ तरीके को स्पष्ट नहीं किया गया है, लेकिन निश्चित रूप से कोर्ट ने जिस विधि का हवाला दिया है, वह 2006 में एम. नागराज एवं अन्य बनाम भारत संघ मामले में उच्चतम न्यायालय की एक पांच सदस्यीय पीठ द्वारा दिया गया निर्णय है। इस मामले में कोर्ट ने उन संवैधानिक संशोधनों को दी गई चुनौती पर विचार किया था, जिनके माध्यम से एससी और एसटी को प्रोन्नति में आरक्षण देने वाले विभिन्न मामलों, खासकर बहुचर्चित ‘मंडल वाद’ के प्रभावों को निरस्त करने की कोशिश की गई थी।
कोर्ट के समक्ष संविधान के 77वें संशोधन 1995, 81वें (2000), 82वें (2000) तथा 85वें संशोधन 2001 की वैधता के परीक्षण का प्रश्न उठाया गया था। संविधान के 77वें संशोधन अधिनियम 1995 द्वारा अनुच्छेद 16 में खंड 4 ए (लोक सेवाओं में अवसरों की समानता) जोड़ा गया था। दूसरी ओर 81वें संशोधन से अनुच्छेद 16 में खंड बी और 82वें से अनुच्छेद 335 में एक प्रावधान (अनुसूचित जातियों, जनजातियों की सेवाओं और पदों के दावे) को जोड़ने के अतिरिक्त 85वें संशोधन द्वारा अनुच्छेद 16 ( ए) की भाषा में परिवर्तन किया गया था। कोर्ट के समक्ष यह तर्क रखा गया था कि इन संशोधनों ने इंदिरा साहनी मामले में उसके निर्णय को बदलने का प्रयास किया था और संसद ने कथित रूप से न्यायिक शक्तियों का प्रयोग करते हुए संविधान के बुनियादी ढांचे के सिðांत का उल्लंघन किया था। लेकिन शीर्ष न्यायालय ने इन संशोधन अधिनियमों को संवैधानिक रूप से वैध कहा था।
हालांकि इसने फैसला दिया कि यदि राज्य अपने विवेक का प्रयोग करने के लिए तत्पर है और एससी और एसटी के लिए पदोन्नति में आरक्षण का प्रावधान करना चाहता है, तो अनुच्छेद 335 के अनुपालन के अतिरिक्त उसे मात्रात्मक सूचनाएं एकत्र करनी होंगी, जिनसे इन वर्गों के पिछड़ेपन और लोक सेवाओं में उनकी अपर्याप्तता स्पष्ट होती है। साथ ही आरक्षण देने की बाध्यता के बावजूद राज्य का यह दायित्व होगा कि आरक्षण देने की 50 प्रतिशत की ऊपरी सीमा का उल्लंघन नहीं हो। यह भी देखा जाना चाहिए कि क्रीमी लेयर की सीमा सुरक्षित रहे और आरक्षण का विस्तार अनावश्यक रूप से अनिश्चितकाल तक नहीं किया जाए। ध्यान देने वाली बात यह भी है कि अनुच्छेद 355 के तहत एससी और एसटी के रोजगार के संबंध में दावों का समाधान प्रशासन की दक्षता को प्रभावित किए बिना ही किया जा सकता है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि इन सुरक्षा उपायों के बिना अनुच्छेद 16 के तहत अवसर की समानता की संरचना अर्थहीन होगी। वास्तव में भारतीय समाज हमेशा से ही असमानताओं से भरा रहा है। भारतीय समाज जातिगत आधारों पर बना हुआ है। हालांकि भारत के संविधान में समतावाद का सिðांत शामिल है, जिसका अर्थ विभेद-रहित सामाजिक व्यवस्था का निर्माण है। संविधान में अनुच्छेद 39;बीद्ध तथा ;सीद्ध में क्रमशः भौतिक संसाधनों पर समुदाय के स्वामित्व और उत्पादन के साधनों के संकेंद्रण पर रोक लगाने का प्रावधान है। यह भी स्पष्ट है कि इन प्रावधानों का अनुपालन नहीं करना भाग तीन में शामिल मूल अधिकारों का उल्लंघन माना जाएगा। इनके बावजूद व्यापक स्तर पर विद्यमान विषमताओं के कारण आर्थिक पिछड़ापन बना हुआ है।
वर्ष 1953 में गठित पहले पिछड़ा वर्ग आयोग (कालेलकर आयोग) ने कहा था कि भारत में आर्थिक पिछड़ापन सामाजिक पिछड़ेपन का कारण नहीं, बल्कि परिणाम है। स्वतंत्रता पूर्व जिस बड़े पैमाने पर विभेदीकरण प्रचलित था उसकी पृष्ठभूमि में संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद 15(1) में धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान पर विभेद रोकने का प्रावधान किया। इस प्रकार भारत में सामाजिक पिछड़ेपन के कारण जनसंख्या के बड़े भाग को गरिमामय जीवन यापन करने से वंचित रहना पड़ता है। जातिगत आधारों पर सामाजिक अंतर होने के कारण निम्न स्तर की जातियों का उच्च स्तर पर रखी गई जातियों द्वारा शोषण भी होता रहा। लंबे समय तक निम्न सामाजिक स्तर वाली जातियां बिना विरोध के तथाकथित उच्च जातियों की सेवा करने के लिए विवश रही हैं।
केंद्र और राज्य सरकार की नौकरियों में
लागू होगा पदोन्नति में आरक्षणः पासवान
सरकारी नौकरियों में प्रमोशन में रिजर्विशन को लेकर देश के अलग-अलग हाईकोर्ट के आदेश की वजह से कार्मिक विभाग ने 30 सितंबर 2016 को एक आदेश निकालकर एसएस/एसटी कर्मचारियों के सभी तरह की प्रमोशन पर रोक लगा दी थी। उसके बाद से कई ऐसे कर्मचारियों का प्रमोशन रूक गया था। ऐसा होने से इसके विरोध में आवाज उठने लगी थी। आंदोलन शुरू हो गया था। इस संबंध में आए फैसले पर केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान ने कहा कि पदोन्नति में आरक्षण फिर से बहाल होने से कंेद्र सरकार के साथ राज्य सरकारों की नौकरियों में लागू होगा। उन्होंने कहा कि इसे लेकर जो कुछ भ्रम था कि अदालत का निर्देश केवल केंद्र सरकार की नौकरियों में ही लागू होगा, दूर हो गया है। अब कोई संशय नहीं है कि केंद्र के साथ ही राज्य भी कर्मचारियों को पदोन्नति करना शुरू करेंगे।
पासवान ने बताया कि कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग जल्द ही इस संबंध में निर्देश जारी करेगा। इस मुद्दे पर मंत्रियों के एक समूह की बैठक में चर्चा की गई। बैठक में रामविलास पासवान समेत गृह मंत्री राजनाथ सिंह, कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद, सामाजिक न्याय एंव अधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत शामिल हुए थे। सरकार ने इस समूह का गठन दलित और आदिवासी जनसंख्या से संबंधित मुद्दों पर चर्चा करने के लिए किया है। विभिन्न उच्च न्यायालयों के आदेशों का परिणाम यह हुआ था कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए सरकारी नौकरियों में पदोन्नति में आरक्षण रूक गया। इस संबंध में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की अपील पर सुनवायी करते हुए उसे इसकी इजाजत दी कि मामले में जब तक अंतिम फैसला नहीं आ जाता वह पदोन्नति में आरक्षण मुहैया कराने पर आगे बढ़ सकता है।
पासवान ने यह भी कहा कि दलितों और आदिवासियों पर अत्याचार के मामलों पर एक कानून के मूल प्रावधानों को बहाल करने के लिए सरकार ने एक अध्यादेश तैयार कर रखा है, लेकिन वह अपनी पुनर्विचार अर्जी पर सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले का इंतजार करेगी। इस संबध में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का लगभग सभी प्रमुख पार्टियों ने कहा था कि इससे कानून कमजोर हुआ है। - मुख्य प्रतिनिधि